गुरुवार, 29 दिसंबर 2011

कीड़याँ का कटरया चाला हे, मनै तेरी सूं

कीड़याँ का कटरया  चाला हे, मनै तेरी सूं.
देख्या ढंग निराला हे, मनै तेरी सूं.

कीड़याँ म्ह का कीड़ा, वो तो मेरी तरफ लखावै था.
जोड़े हाथ खड़ा बेबे, वो गर्दन पूरी घुमावै था.
आरी बरगी टांगा आला हे, मनै तेरी सूं.

कीड़ों से अपनी भूख मिटाता.
क्यां ऐ का ना परहेज़ पूगाता.
काम करै स्प्रे आला हे, मनै तेरी सूं.

जापे तै पहल्यां जापे की तैयारी.
मिलने तै पाछै खसम की बारी.
देखा ढंग कुढाला हे, मनै तेरी सूं.


ना राम की गाँ ना तो यू राम का घोडा,
मांसाहारी कीट सै, बेबे यू हथजोड़ा,
गादड़ की सुंडी आला हे, मनै तेरी सूं


1 टिप्पणी:

  1. The life history of benefial insect which is predominantly feed upon harmful insects is a treat to read. The lyrical treatment to the pest-insect-crop through a rusty and dusky voice of female is fabulous. And to describe any thing through female is time tested and superb.

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